Ajay Siyaram

AJAY SIYARAM

WRITER | SHAYAR

"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"

Aawaz do kahan ho Sanam || Heart Touching Nazam shayari by Ajay Siyaram

• ये खामोशियाँ डस रही हैं, ये तन्हाई गवाह है,

मैं वहीं खड़ा हूँ, जहाँ से जुदा हुई हमारी राह है।

मेरी साँसें भी अब, लेती हैं तेरा ही दम...

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• वादा किया था तुमने, साथ चलने का जिस राह पर,

देखो, आज खड़ा हूँ तन्हा... मैं उसी मोड़ पर।

मेरे कदमों के निशान तो हैं, मगर परछाई नहीं,

मेरे हिस्से में सिर्फ़ इंतज़ार है, कोई रुसवाई नहीं।

हसरत है कि फिर से, मिल जाएँ हम और तुम...

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• इन कमरों की दीवारों में, तेरी यादें रहती हैं,

मेरी आँखों की नमी, सिर्फ़ तेरी कहानी कहती हैं।

आईने भी अब मुझसे, तेरा पता पूछते हैं,

मेरी वीरान हथेली में, तेरी लकीरें खोजते हैं।

धुंधली सी यादों में... क्या खो गए हो तुम?

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• कभी हवाओं के शोर में, तेरी आहट सुनाई देती है,

वीरानियों में भी तेरी, सूरत दिखाई देती है।

आवाज़ दी तुमने? या हुआ मुझे कोई भ्रम?

तेरा नाम ही मेरी इबादत, तू ही मेरा हर करम...

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• इन रास्तों से पूछो कि, मैं कितनी बार गुज़रा हूँ,

हर अनजान चेहरे में, सिर्फ़ तुझे ही ढूँढा हूँ।

थक गए हैं पाँव मेरे, पर ये दिल नहीं मानता,

तुझे पाने की ज़िद को, ये ज़माना नहीं जानता।

इस लम्बे सफर में... कहीं सो गए हो तुम?

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• सिर्फ़ इस जन्म नहीं, मैं हर जन्म इंतज़ार करूँगा,

ख़ुदा से लड़कर भी, मैं तुझे प्यार करूँगा।

बस एक बार... सिर्फ़ एक बार ये कह दो ना,

कि मेरे सिवा किसी और की, नहीं हो तुम।

मैं यहाँ हूँ... मैं यहाँ हूँ... बताओ कहाँ हो तुम?

• मौसम बदले, साल बीते, मगर तुम न आए,

मेरी आँखों में सिर्फ़ 'सूखे सावन' छाए।

ये हवाएँ भी अब मेरा मज़ाक उड़ाती हैं,

तेरा नाम लेकर, मुझे रोज़ सताती हैं।

इन हवाओं के शोर में... क्या खो गए हो तुम?

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• चाँदनी रातों में, चाँद भी अब मुझसे जलता है,

मेरी तन्हाई देख कर, वो चुपके से पिघलता है।

सितारों से भी मैंने, हर रात तेरा ज़िक्र किया है,

इस टूटे हुए दिल ने, तुझे हर एक पल जिया है।

आसमां की गहराइयों में... क्या छुप गए हो तुम?

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• लिखी है पेशानी पर, जुदाई की ये दास्ताँ,

तुझ बिन अधूरा है मेरा, ज़मीन और आसमां।

मुकद्दर के इन पन्नों पे, आख़िर क्यों है ये सितम?

अगले जनम का नहीं, बस इसी पल का है भरम...

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• दुनिया कहती है कि मैं पत्थरों से बात करता हूँ,

हाँ... मैं हर पल तेरी ही फ़रियाद करता हूँ।

लोग हँसते हैं मेरे इस 'दीवानेपन' पर,

बन गया हूँ तमाशा, तेरे ही वतन पर।

इस हँसती हुई भीड़ में... अकेले रह गए हम,

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• वजूद मेरा अब, एक साये से ज़्यादा कुछ नहीं,

तेरे सिवा इस दुनिया में, मेरा इरादा कुछ नहीं।

साँसों की ये माला, अब टूटने ही वाली है,

उम्मीद की ये शम्मा , अब बुझने ही वाली है।

बुझते हुए इस दीये को... क्या छोड़ गए हो तुम?

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?

• इससे पहले कि मेरी साँसें ग़द्दारी कर जाएं,

और मेरी ये खुली आँखें, हमेशा को पथरा जाएं।

मेरी अर्थी उठने से पहले, बस एक बार आ जाना,

'मुझे कफ़न नहीं, तेरी ज़रूरत है'—ये दुनिया को बतलाना।

मौत के बिस्तर पे भी... मेरा इश्क़ न होगा कम,

आवाज़ दो कहाँ हो... कहाँ हो सनम?"