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शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ग़ज़ल: मुझे नींद नहीं आती - अजय सियाराम


सब कुछ लुट गया मेरा, बस एक 'याद' नहीं जाती,

बिस्तर काँटों सा चुभता है, मुझे नींद नहीं आती

 

महफ़िलें अब तो मुझे, काटने को दौड़ती हैं,

झूठी हँसी अब मेरे, लबों को नहीं भाती


हल्क़ से अब तो, निवाला भी उतरता ही नहीं,

ज़िंदगी अब मुझे, हरगिज़ नहीं सुहाती


हकीमों ने भी अब तो, हाथ खड़े कर दिए हैं,

कोई भी दवा अब मुझ पर, असर नहीं दिखाती


मैं रोज़ दुआ माँगता हूँ, इस दुनिया से जाने की,

पर ये कम्बख्त मौत, मुझे गले नहीं लगाती


'अजय' तू क्यों रोता है, उसकी खातिर रात भर?

उसे तो तेरी याद, एक पल भी नहीं रुलाती


— अजय सियाराम

 

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