सुनो...
आज फिर वही शाम उतर आई है,
मेरे कमरे की चौखट पर।
वही पुरानी उदासी, वही पुराना सन्नाटा।
मैं अभी भी वहीं बैठा हूँ,
जहाँ तुम मुझे छोड़कर गए थे।
घड़ी की सुइयाँ तो आगे बढ़ गईं,
मगर मेरा वक़्त... शायद वहीं ठहरा हुआ है।
चाय का कप ठंडा हो चुका है,
और सिगरेट राख बन चुकी है,
मगर ये इंतज़ार है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता।
तुम्हें पता है?
आज भी जब मेरा हाथ मेरे फ़ोन की तरफ बढ़ता है,
तो उँगलियाँ अपने आप तुम्हारी चैट पर रुक जाती हैं।
वही पुराने मैसेज, वही नोट्स
जिन्हें सुन-सुन कर मैं अपनी रातें काटा करता हूँ।
मेरी गैलरी के किसी बहुत गहरे कोने में,
आज भी तुम्हारी वो मुस्कुराती हुई तस्वीर छिपी है,
जिसे डिलीट करने की हिम्मत,
आज तक इस 'अजय' में नहीं आ सकी।
मैं रोज़ सोचता हूँ कि सब मिटा दूँ, सब भूल जाऊँ,
मगर फिर लगता है कि अगर ये यादें भी मिट गईं,
तो मेरे पास जीने की वजह क्या बचेगी?
और ये रातें... ये तो अब दुश्मन बन गई हैं।
तुम्हें तो सुकून की नींद आ जाती होगी न?
मगर यहाँ आलम ये है कि,
अगर गलती से आँख लग भी जाए,
तो सपनों में भी तुम ही चली आती हो।
वही हाथ बढ़ाना, वही पास बुलाना,
और फिर अचानक नींद का टूट जाना...
उस पल जो खालीपन महसूस होता है न,
कसम से, वो मौत से भी बद्तर लगता है।
मैं उठकर बैठ जाता हूँ, अंधेरे में दीवारों को घूरता हूँ,
और खुद से सवाल करता हूँ कि आखिर कमी कहाँ रह गई थी?
दुनिया को लगता है कि मैं संभल गया हूँ।
दोस्तों के साथ हँसता हूँ, काम पर जाता हूँ,
महफ़िल में शेर सुनाता हूँ ,शायरी सुनाता हूँ।
ग़ज़ल गाता हूँ !
मगर वो क्या जानें कि उस हँसी के पीछे,
कितना शोर छिपा है।
मैं भीड़ में होकर भी, सिर्फ़ तुम्हें ढूँढता हूँ।
हर अजनबी चेहरे में, तुम्हारी झलक तलाशता हूँ।
ये शहर, ये रास्ते, ये गलियाँ...
सब कुछ तो वही है,
बस एक तुम नहीं हो,
तो लगता है कि इस शहर की रूह ही मर गई ।
कभी-कभी दिल करता है कि चीख कर आवाज़ दूँ तुम्हें,
पूछूँ कि क्या तुम्हें अब ज़रा सी भी मेरी कमी नहीं खलती?
क्या वो सारे वादे, वो सारी कसमें,
सिर्फ़ कागज़ की कश्तियां थीं,
जो वक़्त की बारिश में गल गईं?
लोग कहते हैं कि सबर कर लो,
कि हर ज़ख्म भरने की दवा है वक़्त के पास।
मगर कोई मेरे दिल से आकर पूछे,
कि जब इंतज़ार ही मुकद्दर बन जाए,
तो वक़्त मरहम नहीं... नमक बन जाता है।
शायद तुम अब कभी नहीं लौटोगे,
ये बात मेरा दिमाग जानता है...
मगर ये कमबख्त दिल है कि नहीं मानता
अब तो बस यही डर लगता है,
कि कहीं मेरी ये आवाज़, ये दर्द तुम तक पहुँचे,
और तुम इसे भी अनसुना कर दो...
ठीक वैसे ही...
जैसे तुमने मेरी मोहब्बत को किया था!
"अजय सियाराम की दुनिया में आपका स्वागत है। यहाँ आपको मिलेंगी रूहानी ग़ज़लें, जज़्बातों से भरी शायरी और कहानियों का एक अनूठा सफ़र (Storytelling)। मेरी हर रचना दिल की गहराइयों से निकली एक आवाज़ है, जो आपसे जुड़ने की कोशिश करती है।"
AJAY SIYARAM
WRITER | SHAYAR
"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"