अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं... कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ?
और हर बार... मैं खामोश हो जाता हूँ।
क्योंकि 'चाहना' एक बहुत छोटा लफ़्ज़ है उस तूफ़ान के लिए, जो मेरे अंदर चलता है।
मैं तुम्हें वैसे नहीं चाहता, जैसे लोग किसी चीज़ को पाने की ज़िद करते हैं।
वो ज़िद तो वक़्त के साथ पुरानी हो जाती है,
मेरी चाहत... कोई ज़िद नहीं, मेरी 'साँस' है।
और साँस पुरानी नहीं होती... वो बस ज़रूरी होती है, ज़िंदा रहने के लिए।
मैं तुम्हें चाहता हूँ...
बिल्कुल वैसे, जैसे तपती हुई ज़मीन... बारिश की पहली बूँद को चाहती है।
सिर्फ़ गीला होने के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्यास बुझाने के लिए।
जैसे एक अंधेरा कमरा... रौशनी की एक लकीर को चाहता है,
सिर्फ़ चमकने के लिए नहीं... बल्कि अपने वजूद को पहचानने के लिए।
मेरे दिन की शुरुआत, सूरज की किरण से नहीं... तुम्हारे ख्याल से होती है।
और मेरी रात का अंत... तुम्हारी यादों की चादर ओढ़कर होता है।
मैं जब आईना देखता हूँ... तो अक्स मेरा होता है, मगर आँखों में तलाश तुम्हारी होती है।
मैं जब भी दुआ के लिए हाथ उठाता हूँ... तो लक़ीरें मेरी होती हैं, मगर क़िस्मत तुम्हारी मांगता हूँ।
सच कहूँ तो...
तुम्हें 'चाहना' अब मेरे बस में नहीं रहा,
ये तो अब मेरे खून में दौड़ता है... मेरी धड़कनों की रफ़्तार बन चुका है।
मैं कोशिश भी करूँ तुम्हें भूलने की... तो शायद मुझे अपनी याददाश्त गंवानी पड़ेगी,
क्योंकि मेरे ज़हन के हर कोने में... सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम लिखा है।
जानती हो? मुझे तुम्हारी वो 'परफेक्ट' तस्वीरें इतनी नहीं भातीं,
जितनी वो बेख़बर सी, उलझी हुई तस्वीरें भाती हैं।
लोग तुम्हारी आँखों की तारीफ़ करते होंगे,
मगर मैं... उन आँखों में छिपी उस मासूमियत को चाहता हूँ,
जो दुनिया की चालाकियां नहीं समझ पाती।
मैं तुम्हें चाहता हूँ... तुम्हारी उन छोटी-छोटी आदतों समेत,
जिन पर शायद तुम्हारा ख़ुद का ध्यान भी नहीं जाता।
वो बात करते-करते अचानक तुम्हारा रुक जाना, और अपनी लटों को कान के पीछे करना...
वो तुम्हारा बिना बात के बच्चों की तरह ज़िद करना,
और फिर अपनी ही ज़िद पर हंस देना।
मुझे तुम्हारा वो गुस्सा भी बहुत प्यारा है।
जब तुम नाराज़ होती हो, तो मुँह फेर लेती हो,
पर मुझे पता होता है कि तुम कनखियों से... मुझे ही देख रही हो,
यह जानने के लिए कि मैं मना रहा हूँ या नहीं।
मुझे तुम्हारी वो खामोशी भी मंज़ूर है,
जब तुम कुछ नहीं कहती, पर तुम्हारी आँखें पूरी कहानी कह देती हैं।
मैं तुम्हारे माथे की उस शिकन को भी चूमना चाहता हूँ जो फिक्र में पड़ती है,
और तुम्हारे उन आँसुओं को भी अपनाना चाहता हूँ, जो तुम दुनिया से छिपाती हो।
मैं तुम्हें सिर्फ़ तब नहीं चाहता जब तुम सजी-संवरी होती हो,
मैं तुम्हें तब भी चाहता हूँ जब तुम थकी होती हो, बिखरी होती हो,
जब तुम ख़ुद को आईने में देखना पसंद नहीं करती...
तब भी... तुम मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ लगती हो।
क्योंकि इश्क़ चेहरे से नहीं...
उस 'सुकून' से होता है, जो सिर्फ़ तुम्हारे पास होने से मिलता है।
जानती हो? लोग कहते हैं कि सच्चे इश्क़ में डर की कोई जगह नहीं होती।
मगर सच तो ये है... कि जितना ज़्यादा इश्क़ होता है,
उतना ही गहरा खोने का डर भी होता है।
मुझे अपनी मौत से डर नहीं लगता,
मुझे डर लगता है तो बस इस ख़याल से... कि मेरे जाने के बाद तुम्हारा क्या होगा?
क्या तुम वैसे ही हंसोगी? क्या तुम अपना खयाल रख पाओगी?
और इसीलिए... आज मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ।
शायद ये बात कहते हुए मेरी आवाज़ कांप जाए, पर तुम्हारा सुनना ज़रूरी है।
मैं चाहता हूँ... कि मेरे बाद भी तुम 'आबाद' रहो।
मेरी याद तुम्हें कमजोर न करे, बल्कि तुम्हारी ताकत बने।
मैं नहीं चाहता कि मेरा नाम तुम्हारी आँखों में आंसू लाए,
मैं चाहता हूँ कि मेरा ज़िक्र तुम्हारे चेहरे पर एक सुकून वाली मुस्कान लाए।
वादा करो...
कि अगर कल मैं तुम्हारे साथ न रहूँ, तो तुम ज़िंदगी से मुंह नहीं मोड़ोगी।
तुम उन सब चीज़ों से प्यार करोगी, जिनसे हम मिलकर प्यार करते थे।
तुम बारिश में भीगना नहीं छोड़ोगी, तुम खुलकर हंसना नहीं छोड़ोगी।
मुझे वो ग़मगीन और टूटी हुई 'तुम' नहीं चाहिए।
मुझे वो 'तुम' चाहिए, जो हर मुश्किल के सामने चट्टान बनकर खड़ी रहे।
क्योंकि मैंने तुम्हें अपनी 'ज़िद' के लिए नहीं चाहा,
मैंने तुम्हें अपनी 'रूह' से चाहा है...
और रूह कभी अपने महबूब का बुरा नहीं सोच सकती।
इसलिए, मेरी मोहब्बत की बस एक ही शर्त है...
कि चाहे मैं रहूँ... या न रहूँ...
तुम्हारी ख़ुशी मेरे लिए सबसे ज़रूरी है,
तुम्हारी हंसी... मेरी अमानत है, जिसे तुम्हें संभाल कर रखना होगा।
मैंने सुना है... कि जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते।
पर ये नियम हम पर लागू नहीं होगा।
क्योंकि मैं तुम से दूर जा ही कहाँ रहा हूँ?
बस इतना समझ लेना...
कि जब कभी ठंडी हवा तुम्हारे गालों को छूकर गुज़रे...
तो वो सिर्फ़ हवा नहीं होगी, वो मेरा स्पर्श होगा जो तुम्हें यकीन दिलाने आया है...
कि मैं यहीं हूँ।
जब कभी तुम धूप में चलो और कोई साया तुम्हारे साथ चले...
तो डरना मत, वो मैं हूँ... जो आज भी तुम्हारी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ।
मैं ये दुआ तो नहीं मांगूंगा कि तुम्हें कोई और मिल जाए,
क्योंकि सच कहूँ... तो तुम्हें किसी और के साथ देखने की हिम्मत,
मेरी रूह में भी नहीं है।
पर हाँ... मैं तुम्हें 'जीते हुए' देखना चाहता हूँ।
मेरी यादों को बेड़ियों की तरह नहीं, पाजेब की तरह पहनना...
जो तुम्हें चलने से रोके नहीं, बल्कि तुम्हारे हर कदम पर संगीत बनकर साथ दे।
तो बस... अब और कुछ नहीं कहना।
हक़ीक़त में न सही, तो यादों में ही सही,
फासलों में न सही, तो ख़्वाबों में ही सही...
ये 'अजय'... अपनी आख़िरी साँस तक... और उसके बाद भी...
सिर्फ़ और सिर्फ़ 'तुम्हें' चाहता है।
मैं तुम्हें चाहता हूँ...
"अजय सियाराम की दुनिया में आपका स्वागत है। यहाँ आपको मिलेंगी रूहानी ग़ज़लें, जज़्बातों से भरी शायरी और कहानियों का एक अनूठा सफ़र (Storytelling)। मेरी हर रचना दिल की गहराइयों से निकली एक आवाज़ है, जो आपसे जुड़ने की कोशिश करती है।"
AJAY SIYARAM
WRITER | SHAYAR
"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"