Ajay Siyaram

AJAY SIYARAM

WRITER | SHAYAR

"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"

Mukarrar Saza | Hindi Sad poetry by Ajay Siyaram

लोग कहते हैं कि जुदाई के बाद इंसान टूट जाता है,

बिखर जाता है, रोता है, तमाशा करता है।

मगर मैंने... मैंने एक अलग रास्ता चुना।

मैंने न तो शोर मचाया, न आँसू बहाए।

बस एक खामोश फैसला लिया...

एक ऐसी सज़ा, जो उम्र भर मुझे पल-पल मारती रहे।

हाँ...

'ये सज़ा खुद के लिए मैंने मुकर्रर की है,

कि मैं हंसता रहूँ... तेरे छोड़ जाने के बाद भी।'"


"तुम्हें पता है? यह दुनिया कितनी पागल है।

इन्हें मेरा यह हंसता हुआ चेहरा दिखता है,

तो इन्हें लगता है कि मुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ा।

इन्हें लगता है कि मेरा ज़ख्म भर गया है।

वाह! क्या अदाकारी है मेरी।

इन्हें क्या खबर... कि इस हंसी के पीछे,

मैं अपनी ही चीखों का गला घोंट कर खड़ा हूँ।

जब कोई पूछता है— 'और भाई, कैसे हो?'

और मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ— 'बढ़िया हूँ यार!'

तो कसम से... वो झूठ मेरे गले में कांच की तरह चुभता है।"


"और जानते हो मैंने यह सज़ा क्यों चुनी?

ताकि तुम... तुम इल्ज़ाम से बच सको।

अगर मैं रोता, बिखर जाता...

तो शायद हवाओं के ज़रिए खबर तुम तक पहुँच जाती।

शायद तुम्हारी नई दुनिया में, तुम्हारी खुशियों में थोड़ी खलल पड़ जाती।

तुम्हें लगता कि तुमने मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।

इसलिए मैं हंस रहा हूँ।

ताकि तुम सुकून से रहो, यह सोचकर...

कि अजय तो खुश है, अजय तो जी रहा है।"


"मगर सच कहूँ?

रो लेना आसान था...

आंसुओं के साथ दर्द बह जाता है।

लेकिन यह मुस्कुराना... यह बहुत थका देता है यार।

अंदर एक शमशान जल रहा हो,

और बाहर होठों को जबरदस्ती मोड़ कर एक 'स्माइल' चिपकाना...

इससे बड़ी यातना  और कोई नहीं हो सकती।"


"तो देख लो... मैं जीत गया।

दुनिया की नज़र में भी, और तुम्हारी नज़र में भी।

सबको लगता है मैं 'संभल' गया हूँ।

मगर आईने में जब खुद को देखता हूँ, तो रूह कांप जाती है।

क्योंकि मैं ज़िंदा नहीं हूँ...

मैं बस एक किरदार निभा रहा हूँ।

और यह उम्र भर की सज़ा है...

कि मुझे हंसना है... बस हंसना है...

तेरे जाने के बाद भी।"

तेरे लिये…. बहुत शुक्रिया