Ajay Siyaram

AJAY SIYARAM

WRITER | SHAYAR

"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"

Heer Ranjha Ki Kahani: Amar Prem (अमर प्रेम) (Emotional Love Sad Story) Part-7

          


भागते-भागते वो थक चुके थे,

किस्मत के आगे झुक चुके थे।l

'राजा अदली' की फौज ने उन्हें घेर लिया,

वापस जंजीरों में, दोनों को फेर लिया।

दरबार लगा, और राजा ने फैसला सुनाया,

'हीर खेड़ों की है'—उसने यह फरमान बताया।

रांझा ने जब सुनी, यह बेइन्साफ़ी की बात,

उसने आसमान की तरफ, उठाए अपने हाथ।

उसने एक ऐसी 'आह' भरी, दिल को चीरकर,

कि रaja के शहर में आग लग गयी, बिना माचिस की लकीर पर।

राजा डर गया, उस जोगी की बद्दुआ से,

बोला—'माफ़ कर दे जोगी, डरता हूँ मैं खुदा से।

ले जा अपनी हीर को, यह तेरी ही अमानत है,

सच्चे इश्क़ को रोकना... ख़ुदा की लानत है।'"


"वो जीत गए थे, खुशियां वापस आयी थीं,

पर किस्मत ने कुछ और ही साजिशें रचाई थीं।

हीर के घर वाले आए, मीठी जुबान लेकर,

बोले—'रांझा! तू हीर को ले जा, अपनी शान लेकर।

यूँ भाग कर ले जाना, इज़्ज़त के खिलाफ है,

जा घर जा, और बारात लेकर आ... हमारा दिल अब साफ़ है।'

रांझा, जो दिल का साफ़ था, वो बातों में आ गया,

उनका वो झूठा प्यार, उसके दिल को भा गया।

तय हुआ कि रांझा, बारात लेकर आएगा,

और अपनी हीर को, डोली में ले जाएगा।

वो चला गया खुशी-खुशी, शादी की तैयारी में,

इधर हीर को कैद कर लिया... मौत की क्यारी में।"


"शादी का दिन आया, शहनाई बज रही थी,

पर हीर के लिए, चिता सज रही थी।

दुष्ट चाचा 'कैदो' ने, फिर खेल रचाया,

एक लड्डू में उसने, कोबरा का ज़हर मिलाया।

वो आया हीर के पास, झूठा प्यार जताते हुए,

बोला—'बेटी! यह खा ले, रस्म निभाते हुए।'

हीर ने खा लिया वो ज़हर, यह सोचकर कि शगुन है,

उसे क्या पता था, कि यही उसकी मौत का लगन है।

लड्डू हलक से नीचे उतरा, और जिस्म नीला पड़ने लगा,

साँसें उखड़ने लगीं, और जीवन झगड़ने लगा।"


"उसने तड़प कर पुकारा—'रांझा! तुम कहाँ हो?

आ जाओ जल्दी, मेरे जिस्म-ओ-जान तुम कहाँ हो?'

ज़हर फैल गया नस-नस में, अँधेरा छा गया,

मौत का फरिश्ता, उसे लेने आ गया।

आखिरी हिचकी ली, और आँखें पथरा गयीं,

हीर की वो सुंदर काया... मिट्टी में समा गयी।

घर वालों ने रोना पीटना मचाया, ये दिखावा था,

कि 'हाय! हीर को सांप ने काटा', ये उनका छलावा था।"


"उधर रांझा आया, बारात लेकर द्वार पर,

सपने सजाए बैठा था, घोड़े के सवार पर।

पर जब उसने देखा, कि शहनाई नहीं, मातम है,

डोली नहीं वहाँ... बस मौत का आलम है।

किसी ने बताया—'तेरी हीर तो कब की सो गयी,

सांप काटने के बहाने... वो हमेशा की हो गयी।'

रांझा भागा लाश की तरफ, और दीवानों सा हँसा,

'उठ हीर! देख तेरी बारात आयी है, तू किस नींद में फंसा?'

पर हीर न उठी... वो ठंडी पड़ चुकी थी,

रांझा की दुनिया, वहीं उजड़ चुकी थी।"


"रांझा ने देखा, वो ज़हरीला लड्डू वहीं पड़ा था,

मौत का वो प्याला, उसके सामने खड़ा था।

उसने कहा—'हीर! तू अकेले नहीं जाएगी,

ये रांझा की रूह, तेरे साथ ही आएगी।'

उसने खा लिया वो ज़हर, एक ही बार में,

और गिर पड़ा अपनी हीर के, मज़ार में।

दोनों के हाथ मिले, और साँसें थम गयीं,

दो जिस्म मर गए... पर रूहें मिल गयीं।"


"आज भी उस मज़ार पर, परिंदे सर झुकाते हैं,

आज भी हवाओं में, उनके किस्से गाए जाते हैं।

दुनिया ने उन्हें मारा, पर वो अमर हो गए,

इश्क़ की किताबों में, वो सबसे ऊपर हो गए।

न कोई खेड़ा रहा, न कैदो, न वो समाज रहा,

सदियों से बस... हीर और रांझा का राज रहा।"



"तो दोस्तों, ये थी हीर और रांझा की दास्तां। एक ऐसी मोहब्बत जिसने मौत को भी हरा दिया। इश्क़ जिस्म का नहीं, रूह का नाम है... और रूह कभी नहीं मरती। धन्यवाद!"