"वो तख्त हज़ारा छोड़ दिया
अपनों ने ही दिल तोड़ दिया।
जो कल तक था शहज़ादा...
उसने काँटों से नाता जोड़ लिया।
रेशम का चोला उतार दिया,
सब ऐश-ओ-आराम वार दिया।
जब भाभी ने ताने मारे थे,
हम अपनों से ही हारे थे।
अब न कोई भाई, न साया है,
बस सिर पर इश्क़ का साया है।
घर-बार को पीछे छोड़ चला,
मैं झांग की जानिब (तरफ) मोड़ चला।
बस एक 'बांसुरी' साथ ली,
और दुनिया से मुँह मोड़ लिया।
जो रस्ता 'हीर' को जाता है...
मैंने वही रस्ता चुन लिया।"
"चलते-चलते शाम हुई,
नदी किनारे रात हुई।
सामने बहती 'चेनाब' थी,
लहरों में एक ख़्वाब थी।
वहाँ एक 'बेड़ी' (नाव) सजी हुई थी,
फूलों से वो ढकी हुई थी।
'लुड्डन' मल्लाह वहाँ खड़ा था,
अपनी ज़िद पर वो अड़ा था।
मैंने कहा—'किनारे लगा दे,
मुझको उस पार पहुँचा दे।'
उसने देखा मेरा हाल,
जैसे मैं हूँ कोई कंगाल।
बोला—'तू तो एक फ़कीर है,
ये गद्दी... सिर्फ़ 'हीर' की है।'
उसने मुझको झिड़क दिया,
नाव से पीछे सरका दिया।
मैं लड़ा नहीं, न शोर किया,
बस रेत पे अपना बिस्तर किया।
जब उस मल्लाह ने मेरी न मानी,
मैंने 'वंझली' (बांसुरी) अपनी तानी।
फिर ऐसी एक 'धुन' बजाई...
जिसने बहती नदी भी रुकाई।"
"सुरों का ऐसा जादू छाया,
मल्लाह को भी रोना आया।
उसने दोनों हाथ जोड़ लिए,
अपने ही सारे नियम तोड़ दिए।
बोला—'माफ़ कर, तू इस सेज (Bed) पे सो जा,
रात भर के लिए खो जा।'
रांझा तो थका-हारा था,
वो बस नींद का मारा था।
वो हीर के पलंग पे सो गया,
एक गहरे सुकून में खो गया।
फिर सुबह-सुबह एक शोर हुआ,
नदी किनारे कुछ ज़ोर हुआ।
'हीर' अपनी सखियों संग आयी,
साथ में जैसे क़यामत लायी।
देखा—कोई उसकी जगह पे सोया है,
जो चादर ओढ़ के खोया है।
वो ग़ुस्से में लाल हो गयी,
बोली—'ये किसकी मजाल हो गयी?'
उसने 'छड़ी' हाथ में उठा ली,
ग़ुस्से से आँखें लाल बना ली।
जैसे ही 'चोट' मारने लगी,
रांझा की आँख खुलने लगी।
चेहरे से पर्दा हट गया,
वहीं पर 'वक़्त' सिमट गया।
सूरत देखी जो दिलदार की,
बात भूल गयी तकरार की...
वो मारने आयी थी जिस 'चोर' को,
दिल दे बैठी उस 'चितचोर' को।"
"वो ग़ुस्सा सारा पिघल गया,
मौसम दिल का बदल गया।
हाथों से वो 'छड़ी' गिर गयी,
नज़रों की दुनिया फिर गयी।
उसने पूछा—'कौन हो तुम?
किसकी तलाश में गुम हो तुम?'
राँझा बोला—'न पूछो मेरा नाम,
मैं तो हूँ बस तुम्हारा ग़ुलाम।'
हीर हँस के बोली—'क्या काम करोगे?
मेरे अब्बा से क्या दाम लोगे?'
राँझा बोला—'दाम नहीं, बस दीदार चाहिए,
बदले में सिर्फ़ तेरा प्यार चाहिए।
मैं तेरी 'मझियाँ' (भैंसें) चराऊँगा,
रोज़ तुझे देखने आऊँगा।
यही मेरी तन्ख्वाह होगी,
बस तेरी रज़ा ही पनाह होगी।'
हीर ने भी हामी भर दी,
इश्क़ की नौकरी पक्की कर दी।
उसने 'तख्त-ओ-ताज' भुला दिया,
ख़ुद को 'चाक' (नौकर) बना लिया।
अब यही उसकी तक़दीर थी,
जहाँ रांझा था... वहीं हीर थी।"
"अब जंगल बना 'बहार' था,
हर तरफ बस प्यार था।
वो रोज़ सवेरे आती थी,
'चूरी' (मिठाई) साथ में लाती थी।
अपने हाथों से खिलाती थी,
वो हक़ अपना जताती थी।
जब रांझा 'बांसुरी' बजाता था,
सारा जग थम जाता था।
भैंसें भी सब झूमती थीं,
हवाएं उनके क़दम चूमती थीं।
न कोई फ़िक्र, न कोई डर था,
बस इश्क़ का ही असर था।
एक दिन नहीं, 'बारह' साल बीते,
इश्क़ के हमने कई हाल जीते।
सर्दी, गर्मी या बरसात हुई,
बस जंगल में ही मुलाकात हुई।
न थकान हुई, न वो कभी हारा,
उसने हँस के किया हर काम गवारा।
वो भैंसें चराता, वो आती रही,
मोहब्बत की जड़ें... गहराती रहीं।
मगर ये खुशियां... अब चुभने वाली थीं,
ये घड़ियाँ बस गिन-गिन की थीं।
किसी की बुरी नज़र लगने वाली थी,
इश्क़ की दुनिया उजड़ने वाली थी।
जो 'ज़हर' घोलने आ रहा था...
वो 'कैदो' (विलेन) मंडरा रहा था।"