Ajay Siyaram

AJAY SIYARAM

WRITER | SHAYAR

"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"

Heer Ranjha Ki Kahani: Heer Ranjha Ka Milan (Emotional Love Sad Story) Part-6

 


"रंगपुर की गलियों में, एक अजीब हलचल थी,

हवाओं में आज, कुछ अलग ही 'कल-कल' थी।

कानों में भारी बालियाँ, जिस्म पर थी राख,

वो जोगी आया था करने, दुखों को खाक।

उसने आवाज़ लगाई—'अलख निरंजन! अलख निरंजन!'

जो सोया था बरसों से, जाग उठा वो मन-रंजन।

गाँव की औरतें दौड़ीं, उसे देखने को,

अपना सारा काम-काज, वहीं फेंकने को।

कोई बोली—'ये जोगी नहीं, कोई राजकुमार लगता है,

इसकी आँखों में तो, रब का दीदार लगता है।'

पर जोगी की नज़रें, बस एक द्वार ढूँढ रही थीं,

वो उस 'खेड़ों' की हवेली को, घूर रही थीं।"


"वो पहुँचा सीधे, सैदा खेड़ा के द्वार,

जहाँ खड़ी थी 'सहती', तेज तर्रार।

(सहती, हीर की ननद थी, जिसकी जुबान कैंची थी)

वो गरज कर बोली—'अरे ओ बाबा! तू कौन है?

यहाँ खड़ा-खड़ा क्यों, इतना मौन है?

मांगने आया है भीख, तो सर झुका कर मांग,

यूँ अकड़ कर मेरे घर के, अंदर मत झांक।

मुझे तो तू कोई ढोंगी, मक्कार लगता है,

तेरी नियत में मुझे, कोई विकार लगता है।'

जोगी हँसा और बोला—'न मांगू धन, न दौलत,

मैं तो आया हूँ देखने, बस खुदा की कुदरत।

तेरी जुबान कड़वी है बेटी, पर दिल साफ़ कर दूंगा,

जो भी गुनाह किये हैं, सब माफ़ कर दूंगा।'"


"बाहर शोर सुनकर, हीर भी चौंक गयी,

वो आवाज़... जो रूह में, काँटे सी भोंक गयी।

'ये आवाज़ तो... नहीं! ये वो नहीं हो सकता,

मेरा रांझा तो फकीर, नहीं हो सकता।'

हाथ में भिक्षा लेकर, वो बाहर आयी,

घूँघट की आड़ में, थी परछाई छाई।

जोगी ने जब देखा, हीर को सामने,

मुश्किल हो गया उसे, खुद को थामने।

हीर ने जैसे ही, भिक्षा झोली में डाली,

नज़रें मिलीं... और दुनिया रुक गयी सारी।

वो आँखें... वो ही दर्द... वो ही कशिश पुरानी,

हीर समझ गयी, वापस आ गयी उसकी जवानी।

भिक्षा गिर गयी ज़मीन पर, हाथ काँप गए,

बिना बोले ही दोनों... सबकुछ भांप गए।"


"सहती ने देख लिया, ये नज़रों का खेल,

समझ गयी कि ये है, दो दिलों का मेल।

सहती का भी एक राज़ था, 'मुराद' था उसका यार,

वो भी तड़प रही थी, करने को प्यार।

जोगी ने सहती को, राज़दार बना लिया,

उस तेज तर्रार लड़की को, अपना बना लिया।

बोला—'तू मेरी मदद कर, मैं तेरी मदद करूँगा,

तेरे मुराद से तुझे, मैं ही मिलवाऊँगा।'

तय हुआ कि आज रात, दीवार टूटेगी,

आज रंगपुर से, ये इज़्ज़त छूटेगी।

साज़िश रची गयी, हीर को 'सांप' ने काटा है,

इलाज करने वाला, बस ये जोगी दाता है।"


"रात गहरी हुई, और शोर मचा हवेली में,

'हाय हीर को सांप लड़ा', बात फैली हवेली में।

सैदा खेड़ा घबराया, 'बुलाओ उस जोगी को,

वही ठीक करेगा, मेरी इस रोगी को।'

जोगी आया शान से, कमरे को बंद किया,

दुनिया की नज़रों को, उसने धुंध किया।

अंदर हीर थी, और उसका रांझा था,

बरसों बाद मिला, उनका ये सांझा था।

हीर रो पड़ी गले लगकर—'तुम क्यों आए?

तुमने क्यों ये जोगी वाले, भेष बनाए?'

रांझा बोला—'तेरे बिना, मैं राख था हीर,

आ तोड़ दें आज, ये दुनिया की जंजीर।'"


"उधर सहती ने भी, अपना ताला तोड़ा,

मुराद बलोच ने आकर, अपना घोड़ा छोड़ा।

दीवार में सेंध लगाई, रस्ते बनाए गए,

पहतेदारों की आँखों में, धूल उड़ाए गए।

काली अँधेरी रात में, वो भाग निकले,

जैसे पिंजरे से, दो नाग निकले।

खेड़ों के घोड़े दौड़े, पर वो दूर निकल गए,

इश्क़ के राही आज, रस्ते बदल गए।

जंगल, बीहड़, नदी... सब पार कर गए,

वो दुनिया के उसूलों पे, आज वार कर गए।"


"सुबह हुई तो वो, एक बाग में रुके,

थकान से चूर थे, पर न वो झुके।

हीर ने रांझा के कानों को, चूम लिया,

उसके खून से सने गालों को, चूम लिया।

बोली—'अब हमें कोई जुदा नहीं कर पाएगा,

ये ज़माना अब हमारा, क्या कर पाएगा?'

दोनों खुश थे, आज़ाद थे, बेख़ौफ़ थे,

पर उन्हें क्या पता था... कि मौत के क्या शौक थे।

पीछे घोड़ों की टापें, सुनाई दे रही थीं,

मौत की परछाइयां, दिखाई दे रही थीं..."

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"हीर और रांझा भाग तो गए, लेकिन क्या वो बच पाएंगे? अगले और आखिरी एपिसोड में देखिये, इस अमर प्रेम कहानी का दर्दनाक और खूनी अंत... (The End)"