Ajay Siyaram

AJAY SIYARAM

WRITER | SHAYAR

"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"

Heer Ranjha Ki Kahani: Galat Fehmi or DardNak Judai (Emotional Love Sad Story) Part-4

 

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बुल्ली की आँखों में एक शैतानी चमक थी,

उसकी बातों में, झूठ की महक थी।

वो बोली—'अरे ओ रांझा! तू यहाँ बैठा रोता है?

वहाँ तेरी हीर का, सौदा होता है।

तू सोचता है वो, महलों में कैद है?

अरे पगले! वो तो ब्याह की उमीद है।

उसने तो "सैदा खेड़ा" को हाँ कर दी है,

तेरे प्यार की तो, उसने दुआ कर दी है।

वो कल डोली चढ़कर, रंगपुर जाएगी,

और तू यहाँ बैठा... बस बांसुरी बजाएगा।

उसने अपने भाई की इज़्ज़त बचा ली,

और तेरे हिस्से में... बस जिल्लत बचा ली।'"

"रांझा ने सुना, तो दिल धक से रह गया,

आँसुओं का एक सैलाब, आँखों से बह गया।

वो चिल्लाया—'झूठ! ये सब झूठ है तेरा,

हीर मेरी है... और मैं हूँ उसका सवेरा।'

पर बुल्ली ने जब, शगुन की मिठाई दिखाई,

रांझा के पैरों तले से, ज़मीन खिसकाई।

उसके हाथ से वो 'वंझली' गिर गयी,

किस्मत की लकीर जैसे, मिट कर गिर गयी।

वो भागा पागलों सा, हवेली की ओर,

दिल में मचा था, तूफ़ान का शोर।"


"उधर हवेली में, शहनाई बज रही थी,

पर हीर की जिन्दा लाश, दुल्हन बन सज रही थी।

सखियाँ आकर उसे 'हल्दी' लगा रही थीं,

मानो ज़ख्मों पर, नमक लगा रही थीं।

गीत गाए जा रहे थे, खुशियों के नाम के,

पर हीर को लग रहे थे, वो मातम के काम के।

उसने माँ के पैर पकड़े, और गिड़गिड़ाई,

'माँ! मुझे ज़हर दे दे... मत कर ये विदाई।'

पर माँ ने भी आँचल, अपना छुड़ा लिया,

इज़्ज़त की खातिर, बेटी को भुला दिया।"


"रांझा जब पहुँचा, हवेली के द्वारे,

वहाँ खड़े थे, पहरेदार हत्यारे।

ढोल-नगाड़ों की आवाज़, इतनी बुलंद थी,

कि रांझा की चीखें, उनमें ही बंद थी।

उसने पुकारा—'हीर! मैं आ गया हूँ,

तेरे लिए अपनी जान, दांव पे ला गया हूँ।'

मगर भाई 'पतमाल' ने, उसे देख लिया,

और लाठियों से उसे, वहीं घेर लिया।

वो मारते रहे, उसे जानवरों की तरह,

वो सहता रहा, एक पत्थर की तरह।

लहू में लथपथ, वो वहीं गिर पड़ा,

इश्क़ आज फिर, इज़्ज़त से हार खड़ा।"


"अगली सुबह जब सूरज, लाल होकर आया,

'सैदा खेड़ा' बारात, अपने साथ लाया।

घोड़े पे चढ़कर, वो अकड़ रहा था,

हीरों-जवाहरात में, वो जकड़ रहा था।

काज़ी ने ऊँची आवाज़ में, फरमान पढ़ा,

इश्क़ के सीने पर, उसने तीर जड़ा।

पूछा तीन बार—'क्या तुझे ये निकाह कुबूल है?'

हीर जानती थी, ये सवाल नहीं, बस एक भूल है।

उसके होंठ सिले थे, आवाज़ घुट गयी थी,

आंसुओं की लड़ी, गालों पे टूट गयी थी।

चाचा कैदो ने, पीछे से खंजर चुभाया,

जबरदस्ती हीर का सर, हाँ में हिलाया।

काज़ी ने मान लिया, कि रज़ामंदी हो गयी,

और उसी पल हीर... जीती-जागती क़ैदी हो गयी।"


"अब घड़ी आयी, घर से जुदा होने की,

उम्र भर के लिए, अपना सब कुछ खोने की।

बाबुल ने सर पे हाथ रखा, और दी दुआ,

'जा बेटी! सुखी रहियो'... पर ये क्या हुआ?

हीर ने पिता को देखा, आँखों में अंगार थे,

वो पिता नहीं, अब उसके लिए बस व्यापार थे।

उसने चौखट को चूमा, जहाँ रांझा खड़ा होता था,

जहाँ उसका प्यार, हर रोज़ बड़ा होता था।

सखियों ने उसे, डोली में जब बिठाया,

ऐसा लगा जैसे... किसी मैयत को लिटाया।"


"कहारों ने डोली उठाई, 'रंगपुर' की ओर चले,

पीछे छूट गए वो, बचपन के साथी भले।

उधर दूर कहीं, रांझा को होश आया,

धूल उड़ती देखी, तो दिल घबराया।

वो भागा पागलों सा, डोली के पीछे-पीछे,

कांटे चुभते रहे, पैरों के नीचे-नीचे।

वो चिल्लाया—'हीर! मत जा मुझे छोड़कर,

मत तोड़ दम, मेरे दिल को यूँ तोड़कर!'

पर डोली दूर होती गयी, धूल में खो गयी,

रांझा की तक़दीर, आज हमेशा को सो गयी।"

"वो गिर पड़ा रस्ते पर, और आसमान को देखा,

मिट गयी थी आज, उसके हाथ की रेखा।

उसने अपनी वंझली, पत्थर पे दे मारी,

टूट गयी वो धुन, जो हीर को थी प्यारी।

उसने कसम खाई, उसी उड़ती धूल की,

'न रहूँगा रांझा मैं, न चाहत होगी फूल की।'

आज से रांझा मर गया, अब 'जोगी' का जन्म होगा,

देखते हैं रब का दिल... कब हम पे नरम होगा।

हीर चली गयी खेड़ों के देश...

और रांझा ने ओढ़ लिया... अब साधू का भेष।"


"अब कहानी दो रास्तों पर बंट गयी है। एक तरफ हीर ससुराल में घुट रही है, दूसरी तरफ रांझा कानों में बालियाँ पहनकर जोगी बन गया है। क्या ये जोगी अपनी हीर को वापस ला पाएगा? या राख बन जाएगा? पढ़िये अगले एपिसोड में..."