धागा ये चाहतों का, पल में तोड़ दोगी क्या,
गुस्से में आ के मुझको, ऐसे छोड़ दोगी क्या !
मैं मर रहा हूँ तेरी याद में, तड़प-तड़प कर,
मेरी तरफ से आज तुम, रुख मोड़ दोगी क्या !
लिखे थे जो भी मैंने, जज़्बात कोरे कागज़,
वो सारे पन्ने गुस्से में, मरोड़ दोगी क्या !
बची-कुची हैं जो साँसें, मेरे इस सीने में,
उन्हें भी अपने हाथों से, निचोड़ दोगी क्या !
मैं लेट गया हूँ थक के, अब मौत की आगोश में,
मुझे नींद से जगाने को, तुम झिंझोड़ दोगी क्या !
साँसें उखड़ रही हैं 'अजय' की, तेरी गोद में,
टूटे हुए इस दिल को, फिर जोड़ दोगी क्या !
अजय सियाराम
