डोली रुकी रंगपुर में, महलों का द्वार था,
पर हीर के लिए ये, जेल का संसार था।
'सैदा खेड़ा' (पति) खुश था, कि चाँद घर लाया है,
उसे क्या पता था, वो आग का दरिया लाया है।
रात हुई जब, और सैदा कमरे में आया,
हक़ जताने को उसने, जब हाथ बढ़ाया।
हीर शेरनी सी दहाड़ी, 'दूर रह ओ पापी!
ये जिस्म है रांझा का, तू मत कर ना-इन्साफ़ी।'
उसने घूँघट नोच फेंका, आँखों में अंगार थे,
बोली—'तू पति नहीं, तुम सब मेरे गुनहगार थे।
अगर छुआ मुझे, तो ये महल जला दूँगी,
मैं सती हूँ रांझा की, तुझे खाक बना दूँगी।'"
"सैदा खेड़ा डर गया, उस चंडी के रूप से,
जैसे कोई जल गया हो, कड़ी दोपहर की धूप से।
वो कमरे से भाग खड़ा हुआ, हीर जीत गयी,
पर तन्हाई की वो काली रात... रोते हुए बीत गयी।"
"उधर रांझा चलता गया, जंगलों को चीरकर,
अपने ही हाथों, अपनी तकदीर की लकीर को चीरकर।
न भूख की चिंता, न प्यास का भान था,
बस 'टीला जोगियाँ' पर जाने का, उसे अरमान था।
सुना था वहाँ 'गोरखनाथ', इश्वर के प्यारे हैं,
टूटे हुए दिलों के, बस वही सहारे हैं।
चढ़ता गया वो पहाड़, जहाँ बादल झुकते हैं,
जहाँ दुनिया के सारे शोर, आकर रुकते हैं।
पैरों में छाले थे, पर रूह में जूनून था,
उसे तो बस अब, फकीरी में सुकून था।"
"धूनी रमाए बैठे थे बाबा, चेहरे पे तेज था,
रांझा के लिए वही अब, आखिरी सेज था।
वो चरणों में गिरा और बोला—'बाबा मुझे जोग दो,
इस दुनिया के दर्द से, मुझे अब वियोग दो।
छीन लो मेरी जवानी, ये रूप-रंग ले लो,
बस मुझे अपनी शरण में, अपने संग ले लो।'
गोरखनाथ ने देखा, उस बांके जवान को,
बोले—'अरे पगले! क्यों छोड़ता है जहान को?
जोग का रास्ता है काँटों का, तू सह नहीं पाएगा,
भूखा-प्यासा, नंगे बदन, तू कैसे रह पाएगा?
लौट जा घर को, यह आग का दरिया है,
जोग नहीं खेल कोई, यह तो मौत का जरिया है।'"
"रांझा हँसा और बोला—'मौत से क्या डराते हो?
मैं तो कब का मर चुका हूँ, तुम किसे समझाते हो?
मेरा दिल तो हीर ले गयी, ये जिस्म बस माटी है,
मेरे लिए अब ये दुनिया, एक सूखी घाटी है।
अगर जोग नहीं दोगे, तो यहीं जान दे दूँगा,
तुम्हारी धूनी में जलकर, मैं प्रमाण दे दूँगा।'
उसकी आँखों में दर्द देख, गुरु का दिल पिघल गया,
पत्थर जैसा इरादा देख, पर्वत भी हिल गया।
बाबा बोले—'ठीक है! अगर इतना ही त्याग है,
तो आजा मेरे पास... तेरे माथे पे भी वैराग है।'"
"फिर वो घड़ी आयी, जब रूह कांप जाती है,
जवानी की उमंग जब, ख़ाक में मिल जाती है।
गुरु ने उठाया खंजर, और रांझा को पास बिठाया,
कानों को चीरने का, जब मंज़र आया।
मोटी-मोटी 'मुंद्रा' (कांच की बालियाँ), कानों में पिरो दी,
खून की धार बही, पर उसने 'उफ़' न की... बस पलकें भिगो दी।
सिर के वो घने बाल, उस्तरे से मूँड़ दिए,
इश्क़ के सारे रस्ते, उसने पीछे छोड़ दिए।
शरीर पर भभूत मली, हाथ में कमंडल लिया,
राजकुमार जैसा रांझा, आज पूरी तरह बदल गया।"
"अब वो रांझा नहीं था, वो एक 'जोगी' था,
न वो प्रेमी था, न अब वो भोगी था।
गले में थी झोली, और जुबान पे 'अलख निरंजन',
छोड़ आया वो पीछे, वो सारे मनोरंजन।
गुरु ने कहा—'जा बच्चा! अब तू आज़ाद है,
तेरा इश्क़ ही तेरी शक्ति, तेरी बुनियाद है।'
जोगी ने उठायी नज़र, और रुख किया 'रंगपुर' का,
इरादा था अब पक्का, उस मगरूर शहर का।
हवाओं ने भी रुख बदला, तूफ़ान आने वाला था,
एक जोगी अब महलों की, ईंट से ईंट बजाने वाला था।"
अजय सियाराम
👇🏻
"अब रांझा जोगी बनकर रंगपुर जाएगा। क्या हीर उसे पहचान पाएगी? और क्या होगा जब सैदा खेड़ा इस जोगी को देखेगा? देखिये अगले और सबसे रोमांचक एपिसोड में..."
