"वो झाड़ियों में छिपा हुआ था,
साँप बनकर वो रुका हुआ था।
नाम जिसका 'कैदो' लंगड़ा था,
ईर्ष्या का रंग उस पर तगड़ा था।
जब देखा उसने हीर-रांझा को,
उस हँसते-खेलते सांझा को।
उसकी आँखों में खून उतर आया,
उसको उनका प्यार नज़र न आया।
वो मन ही मन में जलने लगा,
साज़िश का खंजर चलने लगा।
सोचा—'इनकी हँसी छीन लूँगा,
मैं इश्क़ की ज़मीन छीन लूँगा।'
वो चुपके से वहाँ से खिसक गया,
मानो कोई नाग, डस कर निकल गया।"
"वो भागा-भागा गाँव आया,
तूफ़ान अपने साथ लाया।
सीधे भाई 'पतमाल' के पास गया,
इज़्ज़त का झूठा वास्ता दे गया।
बोला—'अरे पतमाल! तू कैसा भाई है?
तेरी इज़्ज़त की तो जग-हँसाई है।
तेरी बहन चरागाह जाती है,
नौकर को दूध-मलाई खिलाती है।
वो रांझा चोर है तुम्हारे मान का,
दुश्मन है तुम्हारी शान का।
अगर अब भी न तूने रोक लगाई,
तो समझो कुल की हुई हँसाई।'
उसने ऐसी आग लगाई...
जो फिर किसी से बुझ न पाई।"
"पतमाल का माथा ठनक गया,
गुस्सा शोला बनकर भड़क गया।
उसने म्यान से 'तलवार' निकाल ली,
आंखों में जैसे अंगार डाल ली।
शाम को जब हीर घर को आयी,
चेहरे पर थी मासूमियत छाई।
भाई ने न कोई बात सुनी,
न कोई उसकी फरियाद सुनी।
गरज कर बोला—'तूने नाक कटवा दी मेरी,
मिट्टी में मिला दी इज़्ज़त तेरी।
अब चरागाह जाना बंद तेरा,
उस चाक से मिलना बंद तेरा।'
उसने हीर को कमरे में कैद किया,
और पहरा घर पे सख्त किया।"
"फिर उसने सबको पास बुलाया,
अपना एक फरमान सुनाया।
बोला—'अब न कोई देरी होगी,
न हीर की मर्ज़ी, न मेरी होगी।'
फैसला अब ये सख्त होगा,
कल ही उसका 'वक़्त' होगा।
रंगपुर के 'खेड़ों' को ख़बर करो,
बारात लाने का सबर करो।
हम 'सैदा खेड़ा' से ब्याह करेंगे,
इज़्ज़त को अपनी पनाह करेंगे।
हीर अंदर-अंदर रोती रही,
आंसुओं से चेहरा धोती रही।"
"उधर रात हुई, चरागाह में सन्नाटा था,
रांझा के दिल में, डर का एक काँटा था।
भैंसें तो सो गयीं, पर वो जाग रहा था,
वक़्त जैसे उसे, डसने को भाग रहा था।
'आज मेरी हीर, क्यों नहीं आयी?
क्यों नहीं वो, दूध-मलाई लायी?'
उसे क्या पता था, कि महलों में शोर है,
किस्मत का धागा, अब कितना कमज़ोर है।
वो इंतज़ार में था, कि सुबह होगी,
पर उसे ख़बर न थी... कि अब जुदाई होगी।"
"तभी सूखी पत्तियों पर कुछ आहट हुई,
रांझा के कानों में, थोड़ी सुगबुगाहट हुई।
उसने पलट कर देखा, उम्मीद की डोर से,
शायद हीर आयी है, खिंच कर इश्क़ की डोर से।
मगर वो हीर नहीं... वो 'बुल्ली' थी,
जिसकी जुबान, कैंची सी खुली थी।
चुगलखोरी की उसको, पुरानी आदत थी,
दूसरों के दुख में मिलती, उसे राहत थी।
वो रांझा के पास आकर, ज़ोर से हँसी,
जैसे किसी जाल में, मछली हो फँसी।
बोली—'अरे ओ दीवाने! तू किसका रस्ता तकता है?
यहाँ वीराने में बैठकर, क्यों ख़ाक छानता है?'
उसने रांझा के कान में, कुछ ऐसा ज़हर घोला...
मानो आसमान से, कोई बिजली का शोला।
वो क्या कह गयी... रांझा पत्थर हो गया,
जीते जी वो आज... बेघर हो गया।"
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"बुल्ली ने आखिर ऐसा क्या कह दिया कि रांझा की दुनिया हिल गयी? क्या हीर सच में बेवफा हो गयी या यह कोई नयी चाल है? यह सब हम पढ़ेंगे अगले भाग में..."
"अजय सियाराम की दुनिया में आपका स्वागत है। यहाँ आपको मिलेंगी रूहानी ग़ज़लें, जज़्बातों से भरी शायरी और कहानियों का एक अनूठा सफ़र (Storytelling)। मेरी हर रचना दिल की गहराइयों से निकली एक आवाज़ है, जो आपसे जुड़ने की कोशिश करती है।"
AJAY SIYARAM
WRITER | SHAYAR
"मुझे अब दर्द भी.. ‘अजय' दर्द नहीं देता
मगर तेरी यादें ... मुझको खा जाती हैं!"